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#बनारसी #सिल्कसाड़ी #ब्राइडलवेयर #हैंडलूमकॉटन
नवरात्रि दिन 9 · सोमवार, 19 अक्टूबर 2026 · महानवमी

नवरात्रि दिन 9 (मयूर हरा / पीकॉक ग्रीन) 2026: माँ सिद्धिदात्री महानवमी, गरबा फिनाले और हेरिटेज स्टाइलिंग गाइड

लेखक: Vastra Heritage संपादकीय टीम · अंतिम अपडेट

शारदीय नवरात्रि 2026 का पावन दिन 9 सोमवार, 19 अक्टूबर 2026 को मनाया जा रहा है, जो परम कृपालु एवं शक्तिमयी माँ सिद्धिदात्री (महानवमी एवं आयुध पूजा) की अनन्य उपासना को समर्पित है। शास्त्रों में वर्णित नवदुर्गा उपासना क्रम और नवरात्रि के नौ शुभ रंगों की व्यवस्था के अनुसार इस दिन का प्रमुख रंग मयूर हरा / पीकॉक ग्रीन (धूप-छांव मोरपंखी) है। इस मंगलवेला में सूर्योदय की प्रथम किरणों के साथ ही देश भर के देवालयों, शक्तिपीठों और घरों में शंखनाद, वैदिक मंत्रोच्चार और कलश पूजन का अनुष्ठान होता है। दिन भर श्रद्धा-भक्ति का वातावरण रहता है और संध्या होते ही डांडिया व गरबा रास की मधुर तान से पूरा परिवेश गुंजायमान हो उठता है।

महिलाओं, युवतियों और नन्हीं बालिकाओं के लिए इस पावन दिन का परिधान केवल एक सामान्य पोशाक नहीं, बल्कि यह हमारी सदियों पुरानी भारतीय बुनाई परंपरा, सांस्कृतिक आत्मसम्मान और देवी के प्रति अगाध निष्ठा का सजीव प्रतीक है। नौ रातों के इस महापर्व में सही रंग और आरामदायक परिधान धारण करने से अंतर्मन में सकारात्मक ऊर्जा, प्रसन्नता और नवीन उत्साह का संचार होता है। प्रातःकाल पूर्ण शुचिता एवं मर्यादा के साथ संपन्न होने वाली पूजा-अर्चना के लिए पारंपरिक हथकरघा रेशमी साड़ी से लेकर देर रात तक गरबा प्रांगण में तीव्र पदचाप और थिरकन के अनुकूल 10-मीटर घेरेदार सूती चनिया चोली तक, यह परिधान आध्यात्मिक गरिमा और उत्सव के आनंद का अद्भुत संगम प्रस्तुत करता है।

सूरत स्थित वस्त्र हेरिटेज के वरिष्ठ टेक्सटाइल क्यूरेटरों और परिधान विशेषज्ञों द्वारा विशेष रूप से तैयार की गई इस विस्तृत मार्गदर्शिका में शुद्ध हैंडलूम वस्त्रों का चयन, कलीदार घाघरे की वैज्ञानिक सिलाई, पसीना सोखने वाले सूती अस्तर युक्त चोली, प्रातःकालीन पूजा हेतु प्रामाणिक साड़ी ड्रेपिंग, किशोरियों के लिए हाफ-साड़ी (लहंगा वोणी), नन्हीं कन्याओं हेतु सहज पट्टू पावडा, पारंपरिक आभूषण एवं उत्सव उपरांत परिधानों के दीर्घकालिक संरक्षण के समस्त महत्वपूर्ण पहलुओं का समावेश किया गया है।

1. माँ सिद्धिदात्री (महानवमी एवं आयुध पूजा) एवं मयूर हरा / पीकॉक ग्रीन (धूप-छांव मोरपंखी) रंग का आध्यात्मिक रहस्य

माँ सिद्धिदात्री नवदुर्गा का नवम और समस्त सिद्धियां प्रदान करने वाला पूर्ण स्वरूप हैं, जिनकी पूजा महानवमी को होती है। अणिमा, महिमा, गरिमा, लघिमा, प्राप्ति, प्राकाम्य, ईशित्व और वशित्व - ये सभी अष्ट सिद्धियां माँ सिद्धिदात्री की कृपा से ही सुलभ होती हैं। महादेव ने भी इनकी आराधना कर ये सिद्धियां प्राप्त की थीं, जिससे उनका आधा शरीर देवी का हुआ और वे 'अर्धनारीश्वर' कहलाए। ये कमल पर आसीन हैं और सिंह पर भी आरूढ़ हैं। इनकी चार भुजाओं में चक्र, गदा, शंख और कमल पुष्प है। ये साधक की हर कामना पूर्ण करने वाली परम सिद्धमयी माता हैं।

नौवें दिन का रंग मयूर हरा (पीकॉक ग्रीन, धूप-छांव मोरपंखी) पूर्णता, समस्त सिद्धियों का मिलन और ग्रांड फिनाले का प्रतीक है। नीले और हरे रंग के संगम से बना यह रंग शांति और ऐश्वर्य दोनों को दर्शाता है। यह रंग धारण करने से मन में पूर्ण संतोष और उत्सव के चरम आनंद की अनुभूति होती है।

महानवमी हवन और आयुध पूजा (शस्त्र व आजीविका उपकरणों की पूजा) में माँ को चंपा पुष्प और खीर-पूरी अर्पित की जाती है। नवमी हवन में आहुति देते समय पीकॉक ग्रीन साड़ी पहनना परम पावन माना जाता है। रात्रि में नवरात्रि की अंतिम रात गरबा फिनाले में पीकॉक ग्रीन चनिया चोली पूरे प्रांगण में जादुई आभा बिखेर देती है।

वैदिक ज्योतिष और शास्त्रीय मान्यता के अनुसार नवरात्रि के प्रत्येक दिन का संबंध नवग्रहों की अनुकूलता और देवियों की अलौकिक शक्तियों से है। जब महिलाएं पूर्ण श्रद्धा और निष्ठा के साथ इस पावन दिन मयूर हरा / पीकॉक ग्रीन (धूप-छांव मोरपंखी) रंग के पारंपरिक वस्त्र धारण करके भगवती की अर्चना करती हैं, तो उनके पारिवारिक जीवन में सुख, शांति, सौहार्द और सौभाग्य की अभूतपूर्व वृद्धि होती है। यह रंग न केवल बाह्य व्यक्तित्व को अलौकिक दीप्ति प्रदान करता है, बल्कि साधक के अंतर्मन को भी आत्मविश्वास और दिव्य ओज से परिपूर्ण कर देता है।

2. इस पावन दिन हेतु उत्कृष्ट हथकरघा (हैंडलूम) फैब्रिक

उत्सव के पावन दिनों में परिधान का चयन करते समय कपड़े की प्रामाणिकता और प्राकृतिक गुणवत्ता का ध्यान रखना अत्यंत आवश्यक है। बाजार में मिलने वाले सस्ते पॉलिएस्टर, जॉर्जेट या नायलॉन जैसे कृत्रिम कपड़े देखने में भले ही आकर्षक लगें, किंतु गरबा प्रांगण में थोड़ी ही देर में पसीना रोक लेते हैं, जिससे त्वचा पर जलन, खुजली और असहजता होने लगती है। इसके विपरीत भारतीय परंपरा के शुद्ध हथकरघा वस्त्र प्राकृतिक रेशों से बुने होने के कारण त्वचा को निरंतर शीतलता और सहज विश्राम प्रदान करते हैं:

  • डबल शेड कांजीवरम सिल्क (पीकॉक ग्रीन एंड ब्लू): नीले व हरे धागों के ताने-बाने से बुना सिल्क जो मुड़ने पर रंग बदलता है। नवमी हवन हेतु यह परम राजसी है।
  • महाराष्ट्रीयन पैठणी सिल्क: पीकॉक ग्रीन पैठणी पर मोर का जरी पल्लू पूजा हेतु अत्यंत समृद्ध दिखता है।
  • कच्छी गज्जी सिल्क 12-मीटर मेगा घेरा: गरबा फिनाले हेतु गज्जी सिल्क बांधनी सबसे भव्य रूप देती है।
  • 80 काउंट शुद्ध कैम्ब्रिक कॉटन: अंतिम रात की गरबा प्रतियोगिताओं हेतु पसीना सोखने वाला सर्वोत्तम सूती कपड़ा।

भारतीय बुनाई संस्कृति में प्राकृतिक रेशों को दैवीय स्पंदनों को ग्रहण करने का सबसे पवित्र माध्यम माना गया है। जब आप विशुद्ध हैंडलूम परिधान पहनकर पूजा में बैठती हैं अथवा गरबा खेलती हैं, तो यह न केवल हमारे बुनकर समुदाय के श्रम का सम्मान है, बल्कि आपके पूरे व्यक्तित्व को एक राजसी गरिमा और शाश्वत आकर्षण भी प्रदान करता है।

3. गरबा एवं डांडिया रास हेतु मयूर हरा / पीकॉक ग्रीन (धूप-छांव मोरपंखी) चनिया चोली मास्टर गाइड

नवरात्रि का गरबा केवल एक लोकनृत्य नहीं, बल्कि देवी शक्ति की सामूहिक आराधना का उल्लासमय अनुष्ठान है। इस पावन रात्रि में गरबा प्रांगण में आनंदपूर्वक थिरकने के लिए सामान्य आधुनिक लहंगे के स्थान पर प्रामाणिक कच्छी एवं काठियावाड़ी हेरिटेज कट वाली चनिया चोली का चयन करना सर्वश्रेष्ठ निर्णय है:

घाघरे का घेरा एवं कलीदार कट का स्थापत्य (आर्किटेक्चर)

32 कलीदार गज्जी सिल्क मेगा घाघरा चुनें जिसका घेरा 12 से 16 मीटर हो। इस पर कोरल पीच अथवा मस्टर्ड बॉर्डर लगवाएं।

सामान्य गोल अंब्रेला कट घाघरे में कपड़े का घेरा नीचे से अत्यधिक भारी हो जाता है, जिससे तीव्र गति से तीन ताली या दोढिया लेते समय कपड़ा पैरों में उलझने लगता है। इसके विपरीत कलीदार घाघरे में प्रत्येक कली कमर पर संकरी और नीचे जाकर चौड़ी होती है, जिससे घाघरे का पूरा वजन कमर और कूल्हों पर संतुलित रूप से बंट जाता है। इसके फलस्वरूप 10 से 12 मीटर का विशालकाय घेरा होने के बावजूद वजन बिल्कुल हल्का महसूस होता है और प्रत्येक चक्कर के साथ घाघरा हवा में मयूर पंख की भांति लहराता है।

असली आभला (मिरर वर्क) एवं पारंपरिक लोक कशीदाकारी

पीकॉक ग्रीन कपड़े पर सोने व चांदी दोनों धागों का कच्छी काम और असली शीशे लाइट्स में अद्भुत चमकते हैं।

सस्ते प्लास्टिक के सिक्के अथवा फॉइल वर्क गर्मी में पिघलने लगते हैं और बहुत साधारण चमक देते हैं। इसके विपरीत कच्छ की ग्रामीण कारीगर बहनों द्वारा हाथों से टांके गए लेड-फ्री असली शीशे (आभला) शामियाने की तेज फ्लडलाइट्स में हीरों की तरह जगमगा उठते हैं। गम्थी, आरी और रबारी कढ़ाई में प्रयुक्त पक्के सूती और रेशमी धागे कई वर्षों तक अपनी मूल चमक बनाए रखते हैं।

चोली टेलरिंग: सूती अस्तर एवं डोरी बैक

चोली पर प्रिंसेस कट और सुनहरी जरी वर्क करवाएं। कोरल पाइपिंग और सूती अस्तर लगवाएं।

चोली की सिलाई में विशेष ध्यान रखें कि दोनों हाथ ऊपर उठाकर ताली बजाते समय चोली ऊपर न खिंचे। आस्तीन के कटिंग में पर्याप्त मार्जिन रखें और वक्षस्थल पर प्रिंसेस कट कराएं। चोली के भीतर 100% शुद्ध मलमल कॉटन का नरम अस्तर लगवाएं ताकि पसीना तुरंत सूख जाए। पीठ पर गहरे गले के साथ हाथ से बटी मजबूत सूती डोरी और उसके सिरों पर घुंघरू, कौड़ी व रंग-बिरंगे कपड़ों के लटकन लगाएं, जिससे आवश्यकतानुसार फिटिंग को कसने या ढीला करने की पूरी सुविधा रहे।

गरबा की तीव्र गति में दुपट्टा पिन करने की तकनीक

घूमते समय दुपट्टे का बार-बार कंधे से फिसलना हर महिला के लिए एक बड़ी समस्या बन जाता है। इसके लिए गुजराती सीधा पल्लू शैली सबसे उत्तम मानी जाती है: दुपट्टे की समतल प्लेट्स बनाकर उसे दाएं कंधे पर बड़ी सेफ्टी पिन से सुरक्षित कर लें। तत्पश्चात पल्लू के अग्र भाग को सीने के ऊपर से समेटते हुए बाएं कमर पर घाघरे के नेफे के भीतर पिन से कस दें। शेष भाग को पीठ के पीछे से घुमाकर बाएं हाथ या कमर पर संभालें। इस व्यवस्था से दोनों हाथ पूर्णतः स्वतंत्र रहते हैं और डांडिया खेलते समय दुपट्टा अपनी जगह से बिल्कुल नहीं हिलता।

4. प्रातःकालीन पावन पूजा हेतु साड़ी चयन एवं ड्रेपिंग

प्रातःकाल की पावन पूजा एवं आरती के समय पारंपरिक साड़ी धारण करना भारतीय नारी के लिए परम गौरव और सौभाग्य का विषय है:

पूजा हेतु सर्वश्रेष्ठ साड़ी की पसंद

डबल शेड कांजीवरम साड़ी अथवा पैठणी साड़ी नवमी हवन एवं पूजा हेतु सर्वश्रेष्ठ है।

पूजा के समय पहनी जाने वाली साड़ी में पवित्रता, शुचिता और सादगीपूर्ण भव्यता होनी चाहिए। शुद्ध रेशम और सुनहरी जरी से बुनी साड़ियां देवी-देवताओं की कृपा आकर्षित करने के लिए सर्वोत्तम मानी जाती हैं। प्रातः स्नान उपरांत पवित्र भाव से साड़ी धारण करने से दिन भर मन में सकारात्मक ऊर्जा और शांति बनी रहती है।

गुजराती सीधा पल्लू शैली में ड्रेपिंग

सीधा पल्लू शैली में साड़ी पहनें ताकि डबल शेड पल्लू सामने खुलकर आए।

कमर पर प्लेट्स को व्यवस्थित रूप से खोंसने के बाद पल्लू को पीछे से घुमाकर दाएं कंधे पर आगे की ओर लटकाया जाता है। पल्लू की समृद्ध जरी, कलश अथवा मयूर रूपांकन सामने विराजे देवताओं और परिवार के वरिष्ठजनों के समक्ष पूर्णतः दृष्टिगोचर होते हैं, जो पूजा की मर्यादा को शोभायमान करते हैं। बाएं कमर पर पल्लू के कोने को स्वर्ण या मोती जड़ित ब्रोच पिन से सुरक्षित कर लें।

कंट्रास्ट ब्लाउज एवं नेकलाइन डिजाइन

पीकॉक ग्रीन साड़ी संग कोरल पीच अथवा गोल्डन ब्रोकेड ब्लाउज पहनें।

साड़ी के साथ ब्लाउज की सिलाई सदैव गरिमामयी होनी चाहिए। कोहनी तक की आस्तीन (एल्बो लेंथ) और बोट नेक या गोल गला साड़ी के रूप को अत्यधिक शालीन और राजसी बनाता है। आस्तीन पर जरी की महीन लेस या बारीक गोटा पत्ती का कार्य करवाएं।

5. कार्यालय एवं पारिवारिक आयोजनों हेतु शरारा व अनारकली सूट

जो कामकाजी महिलाएं अथवा छात्राएं दिन भर भारी साड़ी या चनिया चोली नहीं पहन सकतीं, उनके लिए आज के पावन रंग में सुरुचिपूर्ण फ्यूजन सूट के उत्कृष्ट विकल्प उपलब्ध हैं:

  • चंदेरी सिल्क अनारकली: पीकॉक ग्रीन अनारकली कुर्ता जिस पर जरी काम हो। संग में मस्टर्ड दुपट्टा लें।
  • टायर्ड शरारा सेट: पीकॉक ग्रीन पेपलम कुर्ती संग शरारा प्लाजो गरबा हेतु अत्यंत सुलभ है।
  • सिल्क कुर्ता पैंट्स: पीकॉक ग्रीन सिल्क कुर्ता संग गोल्डन पैंट्स सोबर रूप देता है।

ऐसे फ्यूजन परिधान पहनने से दिन भर दफ्तर में सहजता से काम करने की पूरी सुविधा रहती है और शाम को सीधे गरबा पंडाल में प्रवेश करते समय भी आप उत्सव के पावन रंग में पूर्णतः रमी हुई दिखाई देती हैं।

6. किशोरियों एवं नन्हीं कन्याओं हेतु विशेष हेरिटेज संकलन

नवरात्रि के पावन दिनों में नन्हीं कन्याओं और किशोरियों का उत्साह देखते ही बनता है। किंतु उनके परिधान का चयन करते समय रूप-सज्जा के साथ शारीरिक आराम और सुरक्षा का ध्यान रखना नितांत आवश्यक है:

नन्हीं बालिकाएं (आयु 3 से 12 वर्ष): आरामदायक पट्टू पावडा एवं लहंगा

नन्हीं कन्याओं हेतु पीकॉक ग्रीन व पीले रंग का पट्टू पावडा अथवा बांधनी चनिया चोली चुनें।

नन्हीं बच्चियों की त्वचा अत्यंत कोमल होती है, अतः परिधान में कभी भी नुकीले शीशे या कड़ा पॉलिएस्टर अस्तर नहीं होना चाहिए। भीतर 100% शुद्ध कॉटन का मुलायम अस्तर लगा होना चाहिए ताकि लंबे समय तक पहने रहने पर भी त्वचा पर लाल चकत्ते या खुजली न हो। कमर पर कड़े इलास्टिक के स्थान पर नरम सूती नाड़ा होना चाहिए ताकि पेट पर अनावश्यक दबाव न पड़े।

किशोरियां (आयु 13 से 19 वर्ष): हाफ-साड़ी एवं लहंगा वोणी

किशोरियों हेतु पीकॉक ग्रीन लहंगा, कोरल चोली और गोल्डन दुपट्टा लहंगा वोणी शैली में पहनें।

किशोरी कन्याओं के लिए लहंगा वोणी शैली परंपरा और आधुनिक फैशन का मनोहारी संतुलन प्रदान करती है। घेरेदार स्कर्ट के साथ क्रॉप्ड चोली और कंधे से लहराता दुपट्टा पहनने से उन्हें साड़ी जैसी परिपक्व सुंदरता मिलती है जबकि उनका चलना-फिरना और नाचना पूर्णतः सहज रहता है।

7. आभूषण सज्जा, आरामदायक मोजड़ी एवं परिधानों का दीर्घकालिक संरक्षण

उचित आभूषणों और आरामदायक पादत्राण (जूती) के बिना नवरात्रि का कोई भी पारंपरिक श्रृंगार अधूरा माना जाता है:

पारंपरिक आभूषणों का चयन

पीकॉक ग्रीन परिधान संग एंटीक गोल्ड टेम्पल ज्वेलरी अथवा ऑक्सिडाइज्ड चांदी की भारी हांसली पहनें।

माथे पर मांग टीका या दामिनी, कानों में झुमके, गले में हांसली या चोकर, हाथों में कांच की चूड़ियों के साथ भारी कड़े, कमर में करधनी (कमरबंद) और पैरों में घुंघरुदार पायल - यह षोडश श्रृंगार नवरात्रि के पर्व को साक्षात दिव्य बना देता है।

पादत्राण (फुटवियर) एर्गोनॉमिक्स: मोजड़ी एवं सपाट जूती

पीकॉक ग्रीन परिधान संग सुनहरी तिल्ला वर्क वाली कुशन युक्त सपाट मोजड़ी पहनें।

गरबा प्रांगण में ऊंची एड़ी (हाई हील्स) पहनने से पैर मुड़ने या फिसलने का भारी जोखिम रहता है। घंटों तक थके बिना उत्साहपूर्वक नृत्य करने के लिए नरम चमड़े और भीतर स्पंज कुशन वाली पारंपरिक जयपुरी या कच्छी मोजड़ी सबसे आदर्श विकल्प है।

सर्वश्रेष्ठ कंट्रास्ट कलर कॉम्बिनेशन

  • पीकॉक ग्रीन + कोरल पीच: अत्यंत आधुनिक, समृद्ध और मनमोहक कंट्रास्ट।
  • मयूर हरा + सरसों पीला (मस्टर्ड): तेजस्वी, भव्य और उत्सव का श्रेष्ठ रूप।
  • पीकॉक ग्रीन + सुनहरी जरी (गोल्ड): नवमी हवन हेतु परम पावन रूप।
  • पीकॉक ग्रीन + रानी गुलाबी: गरबा फिनाले हेतु सबसे लोकप्रिय संयोजन।

गरबा उपरांत परिधानों की समुचित देखभाल

नवरात्रि संपन्न होने पर कपड़ों को पंखे नीचे सुखाएं और मलमल के कपड़े में लपेटकर रखें ताकि जरी वर्षों तक सुरक्षित रहे।

जरी और शीशे के काम वाले बहुमूल्य वस्त्रों पर कभी भी सीधे इत्र या परफ्यूम का छिड़काव न करें, क्योंकि इसके अल्कोहल से जरी काली पड़ जाती है। परिधानों को सदैव बिना कलफ वाले शुद्ध सूती मलमल के कपड़े में लपेटकर किसी नमी-रहित सुरक्षित स्थान पर रखें।

8. नवरात्रि दैनिक नेविगेटर: पूर्व एवं आगामी रंग

नवरात्रि के नौ पावन दिनों के दौरान दैनिक रंगों और भगवती के विभिन्न रूपों के मार्गदर्शन हेतु नीचे दी गई कड़ियों का अवलोकन करें:

पिछला दिनवर्तमान दिनअगला दिन
← दिन 8: बैंगनी और माँ महागौरी दिन 9: मयूर हरा / पीकॉक ग्रीन (धूप-छांव मोरपंखी) (माँ सिद्धिदात्री (महानवमी एवं आयुध पूजा)) दिन 10: विजयादशमी दशहरा →

हमारी प्रमुख संदर्भ निर्देशिकाएं देखें: नवरात्रि के 9 रंग 2026 मास्टर कैलेंडर, नवरात्रि हेरिटेज गरबा फैशन और असली सिल्क की पहचान.

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

नौवें दिन पीकॉक ग्रीन रंग क्यों पहनते हैं?

नौवां दिन माँ सिद्धिदात्री महानवमी का है और पीकॉक ग्रीन समस्त सिद्धियों की पूर्णता व ऐश्वर्य का प्रतीक है।

महानवमी हवन हेतु कौन सी साड़ी उत्तम है?

डबल शेड कांजीवरम सिल्क साड़ी अथवा पैठणी साड़ी हवन हेतु सर्वश्रेष्ठ मानी जाती है।

गरबा फिनाले हेतु घाघरे में कितना घेरा होना चाहिए?

अंतिम रात हेतु 32 कलीदार घाघरे में 12 से 16 मीटर का मेगा घेरा आदर्श है।

पीकॉक ग्रीन घाघरे संग कौन सा दुपट्टा जंचता है?

कोरल पीच, मस्टर्ड यलो अथवा रानी गुलाबी बांधनी दुपट्टा सबसे सुंदर दिखता है।

गरबा हेतु पीकॉक ग्रीन में कौन सा फैब्रिक अच्छा है?

गज्जी सिल्क अथवा 80 काउंट कैम्ब्रिक कॉटन सबसे उत्तम रहता है।

पीकॉक ग्रीन परिधान संग कैसे गहने पहनें?

एंटीक गोल्ड टेम्पल ज्वेलरी अथवा ऑक्सिडाइज्ड चांदी की हांसली पहनें।

नन्हीं बच्चियों हेतु नवमी पर क्या पहनाएं?

पीकॉक ग्रीन और पीले रंग का पट्टू पावडा बच्चियों पर बहुत सुंदर लगता है।

क्या नवमी के दिन आयुध पूजा होती है?

हाँ, नवमी के दिन वाहनों, यंत्रों और आजीविका के औजारों की पावन आयुध पूजा की जाती है।

कांजीवरम साड़ी की देखभाल कैसे करें?

केवल ड्राई क्लीन कराएं और मलमल के कपड़े में लपेटकर रखें।

नवरात्रि बाद चनिया चोली कैसे स्टोर करें?

पंखे में सुखाएं और मलमल में लपेटकर सुरक्षित अलमारी में रखें।